Monday, November 19, 2018

मीटू:एक दिशा(लघुकथा)

घर की सफाई के दौरान मिले पुराने एलबम को शुचि बड़े ध्यान और प्रसन्नता के साथ देख रही थी।इस एलबम में उसके बचपन की फोटो और परिवार के लोगों के अलग अलग मौकों की फोटो भी थी।
        अचानक एक जगह शुचि की आँखें ठिठक गयीं।होली के पर्व पर रंग से भीगी उसकी माँ बड़ी सुंदर दिख रही थी, पर ये पीछे से उसे किसने दबोच रखा था...जिसकी तकलीफ माँ के चेहरे पर साफ दिख रही थी।
         वह माँ के पास एलबम लेकर पहुंच गई और उस आदमी के बारे में पूछने लगी।माँ ने ध्यान से वह फोटो देखी तो अनचाहा दर्द उसके चेहरे पर आ ही गया। "वो कोई होगा ..पता नहीं",बस इतना ही बोल पाई।
         जब शुचि पीछे ही पड़ गयी तो उसने बताया कि वह उसके पापा का एक पुराना दोस्त था।"तो मम्मा आपने उसकी शिकायत नहीं की नहीं..",शुचि ने पूछा और जवाब न में मिलने पर बड़े जोर से बोली..."तो अब करो...मीटू में"।
         " नहीं बेटी, उस घटना को पंद्रह साल हो चुके हैं,तब से न तो हम मिले और न मिलने की कोशिश की।आज हम दोनों के परिवार अपने सम्मान के साथ रह रहे हैं।यह मीटू का तूफान  मेरे अपमान का दर्द तो न खत्म कर सकेगा .....हाँ हमारे परिवार की शांति जरूर बहा ले जायेगा"।
            उसे अपनी माँ की बात अच्छी नहीं लगी।वह मुँह बनाकर वहाँ से जाने लगी।तभी माँ ने एलबम उसके हाथ से लिया और वह फोटो निकालकर फाड़ दी और कहा, "शुचि यह चैप्टर तो आज क्लोज हो गया, लेकिन अगर कभी तुम्हारे साथ कोई ऐसी अप्रिय घटना हो तो तुम मीटू का सहारा जरुर लेना ...लेकिन, यह बताने के लिए नहीं कि कब किसने तुम्हारे साथ क्या गलत किया,बल्कि यह बताने के लिए कि उस गलत सोच को तुम तुरंत सुधार कर एक नयी दिशा दे सकती हो,उसका खुला विरोध करके।"
यह कहकर शुचि को उसकी माँ ने अपने सीने से लगा लिया और माँ की ठहरी हुयी साँसों के साथ शुचि को एक नयी दिशा दिखने लगी।

Sunday, November 18, 2018

अभिवादन

मित्रों नमस्कार,
मैं यहाँ नया हूँ और आप सभी का स्वागत करता हूँ।आप कैसी कहानी चाहेंगे..बताइये।